भारत में पत्रकारिता का जन्म और विकास
भारत में पत्रकारिता का जन्म और विकास
प्रारंभिक चरण (18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध):
भारत में आधुनिक पत्रकारिता की शुरुआत 18 वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) से हुई। जनवरी 1780 में जेम्स ऑगस्टस हिक्की ने ‘हिक्कीज़ बंगाल गज़ट’ नामक अंग्रेज़ी साप्ताहिक समाचारपत्र निकाला, जिसे “एशिया का पहला समाचारपत्र” माना जाता है। यह सरकारी नीतियों विशेषकर वॉरेन हेस्टिंग्स की प्रशासन की आलोचना करने के लिए विख्यात हुआ। दो साल तक प्रकाशित रहने के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी ने इस अख़बार का प्रेस जब्त कर दिया। इसके बाद इंग्लिश भाषा में अन्य पत्रिकाएँ (जैसे India Gazette) आईं, लेकिन प्रारंभिक काल में अधिकांश प्रकाशन ब्रिटिश शासन या मिशनरियों द्वारा संचालित थे।
पहला समाचारपत्र –
हिक्कीज़ बंगाल गज़ट : जनवरी 1780 को प्रकाशित हुआ यह अंग्रेजी-पत्र भारत (और एशिया) में पहला छपा हुआ अख़बार था। इसका प्रकाशक हिक्की एक आयरिश व्यवसायी था, जो अपने लहजे में कटु आलोचना के लिए जाना जाता था। हिक्की के संपादकीय स्वतंत्रता के नारे ने अंग्रेज़ प्रशासन को नाराज़ किया और अंततः 30 मार्च 1782 को सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर इस अख़बार का प्रकाशन बंद कर दिया गया। इस प्रकार प्रारंभिक पत्रकारिता मुख्यतः संचार के साधन के रूप में अंग्रेज़ों की सेवाएँ देती दिखी, किन्तु हिक्की के प्रयासों ने पहले ही चरण में प्रेस की स्वतंत्रता की लड़ाई की नींव रख दी।
राजा राम मोहन राय एवं प्रारंभिक भारतीय पत्रकार
19वीं शताब्दी में राजा राम मोहन राय ने पत्रकारिता को सामाजिक एवं राजनैतिक सुधार का साधन बनाया। राय ने सरकारी सेंसरशिप और कुरीतियों के खिलाफ आवाज़ उठाई तथा फारसी में “मीरातुल अख़बार” (Mirat-ul-Akhbar, 1822) और बंगाली में “संवाद कौमुदी” (Sambad Kaumudi, 1821) जैसे समाचारपत्र निकाले। इनमें उन्होंने ब्रिटिश शासन की नीतियों की आलोचना के साथ-साथ सती प्रथा, बहुविवाह आदि सामाजिक कुरीतियों पर भी प्रहार किया। राय ने प्रेस की स्वतंत्रता का पक्ष रखते हुए कहा कि सरकारी नियमों के कारण सत्य की आवाज़ दबनी नहीं चाहिए।
अन्य प्रारंभिक भारतीय पत्रकारों में द्वारकानाथ टैगोर , गोविंद शंकर साहनी , सुरेंद्रनाथ बनर्जी आदि प्रमुख थे। द्वारकानाथ टैगोर ने राम मोहन राय के सहयोग से “बंगाल हेराल्ड” नामक अंग्रेजी साप्ताहिक शुरू किया, जिसका ऐहतियाती संस्करण “बंगदूत” हिंदुस्तानी (बंगला, हिंदी एवं फारसी) में निकलता था। इस तरह कई भाषाओं में अख़बार निकलने लगे और पत्रकारों ने कई समुदायों तक सुधारवादी विचार पहुंचाए।
पत्रकारिता और स्वतंत्रता संग्राम
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में प्रेस ने जनमानस को जागृत करने और राष्ट्रवादी विचार फैलाने में अहम भूमिका निभाई। अख़बारों ने विदेशी अत्याचारों, राष्ट्रीय आंदोलनों और नेताओं के घोषणापत्रों की खबरें जनता तक पहुंचाईं और विभिन्न वर्गों की आवाज़ को एक मंच दिया। संतरेेकीय नेताओं ने भी मीडिया का उपयोग किया: बाल गंगाधर तिलक ने अपने मराठी अख़बार “केसरी” के माध्यम से “स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार” का नारा फैलाया और सामाजिक सुधारों (महिला शिक्षा, अस्पृश्यता उन्मूलन आदि) की वकालत की। महात्मा गांधी ने अपनी अंग्रेज़ी पत्रिका “यंग इंडिया” में अहिंसा एवं समानता का संदेश दिया। इस तरह के प्रकाशनों ने देशभर में राष्ट्रीय चेतना जगाई।
चुनौतियाँ और सेंसरशिप
ब्रिटिश सरकार ने पत्रकारिता पर कड़ा नियंत्रण रखा। सन् 1823 में लागू प्रेस ऑर्डिनेंस ने अख़बारों के प्रकाशन पर अंकुश लगाया, जिसपर राजा राम मोहन राय ने भी कड़ा विरोध जताया। बाद में 1878 में वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट और 1910 में भारतीय प्रेस अधिनियम जैसे कानून बनाए गए, जो समाचार पत्रों पर सरकार की निगरानी बढ़ाते थे। इन अधिनियमों के तहत कई अख़बारों को बंद किया गया, प्रकाशन लाइसेंस रद्द किए गए और पत्रकारों को मुकदमों में फँसाया गया। इसके बावजूद पत्रकारिता ने दबाव के बावजूद स्वतंत्रता और सुधार की बात करना जारी रखा।
प्रारंभिक दौर की भाषाएँ और स्वरूप
प्रारंभ में पत्रकारिता अंग्रेज़ी में शुरू हुई, फिर शीघ्र ही स्थानीय भाषाओं में भी विकसित हुई। हिंदी में पहला समाचारपत्र ‘उदन्त मार्तण्ड’ 30 मई 1826 को कलकत्ता से निकला। बंगाली में ‘ संवाद कौमुदी’ (1821) तथा मराठी में ‘दर्पण’ (1832) जैसे प्रमुख प्रारंभिक प्रकाशन थे। फारसी में निकली ‘मीरातुल अख़बार’ 1822 को भारत की पहली फारसी पत्रिका मानी जाती है।
प्रारंभिक अख़बार अकसर साप्ताहिक होते थे और संक्षिप्त रूप में छपते थे। उदाहरणत: उदन्त मार्तण्ड 12× 8 इंच के आकार में निकलता था और इसमें ब्रज तथा खड़ीबोली का मिश्रित रूप (मध्यदेशीय भाषा) प्रयुक्त होता था। अख़बारों में उस समय के हाल-ए-सरकार, स्थानीय घटनाओं की रिपोर्ट, सामाजिक-वैज्ञानिक लेख आदि प्रकाशित होते थे। कुल मिलाकर 18 वीं–19 वीं सदी में पत्रकारिता अंग्रेज़ी, हिंदी, बंगाली, फारसी सहित कई भाषाओं में शुरू होकर धीरे-धीरे आधुनिक भारतीय पत्रकारिता की आधारशिला बनी।
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