नामदेव कबीर तिलोचन सधना सेन तरै
नामदेव कबीर तिलोचन सधना सेन तरै।
कह रविदास, सुनहु रे संतहु ! हरि जिउ तें सबहि सरै।
यह दोहा संत रविदास का है, जिसमें उन्होंने संतों के प्रति सम्मान व्यक्त करते हुए यह बताया है कि चाहे संत नामदेव हों, कबीर हों, तिलोचन हों, सधना हों या सेन हों—सभी का उद्धार और सभी की सिद्धि केवल हरि (भगवान) की कृपा से ही संभव है।
दोहा का अर्थ:
"नामदेव, कबीर, तिलोचन, सधना और सेन सभी संतों ने अपने जीवन में साधना की है और ईश्वर का ध्यान किया है। संत रविदास कहते हैं कि सुनो, हे संतों! हरि (भगवान) की कृपा से ही सबकी सिद्धि होती है।"
इस दोहे का मुख्य संदेश यह है कि संतों के सभी प्रयासों और उनकी साधना का सार भगवान की कृपा में है। भगवान के आशीर्वाद के बिना कोई भी व्यक्ति आध्यात्मिक उन्नति या मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकता। यह भक्ति का महत्व और भगवान की कृपा पर निर्भरता को दर्शाता है।
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