जाके कुटुंब सब ढोर ढोवंत/ jaake kutumb sab dhor dhovant - रैदास
जाके कुटुंब सब ढोर ढोवंत
फिरहिं अजहुँ बानारसी आसपासा।
आचार सहित बिप्र करहिं डंडउति
तिन तनै रविदास दासानुदासा ॥
इस दोहे में संत रविदास ने समाज के उच्च और निम्न माने जाने वाले वर्गों के बीच भेदभाव को उजागर किया है। वे इस दोहे के माध्यम से बताना चाहते हैं कि केवल जाति या कर्म के आधार पर किसी की महत्ता नहीं आंकी जानी चाहिए। उनके लिए सच्चे संत वही हैं जो विनम्रता और भक्ति से जीवन बिताते हैं, चाहे उनका परिवार कितना ही सामान्य कार्य क्यों न करता हो।
दोहा का अर्थ:
"जिनके परिवार के सभी सदस्य आज भी जानवरों को चराते हैं और बनारस के आसपास घूमते हैं, वे सभी आचार का पालन करते हुए विद्वान ब्राह्मणों का सम्मान करते हैं। ऐसे लोगों का तन-मन सच्ची भक्ति में लगा हुआ होता है, और मैं (रविदास) ऐसे संतों का दास हूं।"
इसमें संत रविदास यह कहना चाहते हैं कि सच्चे संत वे हैं जो विनम्रता, भक्ति, और ईश्वर-प्रेम में रचे बसे होते हैं, चाहे उनके पारिवारिक कार्य कितने ही साधारण क्यों न हों। रविदास स्वयं को ऐसे भक्तों का "दासानुदास" मानते हैं, जो यह दर्शाता है कि सच्चे संत की पहचान उसकी जाति या कर्म से नहीं, बल्कि उसकी भक्ति और आचरण से होती है।
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