Posts

Showing posts from April, 2025

बूढ़ी काकी की मूल संवेदना पर संक्षेप में प्रकाश डालिए।

Image

जाके कुटुंब सब ढोर ढोवंत/ jaake kutumb sab dhor dhovant - रैदास

 जाके कुटुंब सब ढोर ढोवंत  फिरहिं अजहुँ बानारसी आसपासा।  आचार सहित बिप्र करहिं डंडउति  तिन तनै रविदास दासानुदासा ॥ इस दोहे में संत रविदास ने समाज के उच्च और निम्न माने जाने वाले वर्गों के बीच भेदभाव को उजागर किया है। वे इस दोहे के माध्यम से बताना चाहते हैं कि केवल जाति या कर्म के आधार पर किसी की महत्ता नहीं आंकी जानी चाहिए। उनके लिए सच्चे संत वही हैं जो विनम्रता और भक्ति से जीवन बिताते हैं, चाहे उनका परिवार कितना ही सामान्य कार्य क्यों न करता हो। दोहा का अर्थ:  "जिनके परिवार के सभी सदस्य आज भी जानवरों को चराते हैं और बनारस के आसपास घूमते हैं, वे सभी आचार का पालन करते हुए विद्वान ब्राह्मणों का सम्मान करते हैं। ऐसे लोगों का तन-मन सच्ची भक्ति में लगा हुआ होता है, और मैं (रविदास) ऐसे संतों का दास हूं।" इसमें संत रविदास यह कहना चाहते हैं कि सच्चे संत वे हैं जो विनम्रता, भक्ति, और ईश्वर-प्रेम में रचे बसे होते हैं, चाहे उनके पारिवारिक कार्य कितने ही साधारण क्यों न हों। रविदास स्वयं को ऐसे भक्तों का "दासानुदास" मानते हैं, जो यह दर्शाता है कि सच्चे संत की पहचान उसकी जाति...

मैं मौत चुनूंगा (कविता) - अभिषेक मिश्र

 मौत के बिस्तर पर जीवन के आखिरी क्षण में तुम होगी अगर आखिरी दवा, आखिरी उम्मीद  मैं मौत चुनूंगा हृदय जब अपनी वेदना से हो बेताब फट जाने को मन जब हो परेशान  तुम्हारी एक आवाज सुनने को मैं कुछ नहीं सुनूंगा मैं मौत चुनूंगा इस तन्हाई को  केवल तुम भर सकती हो याद है वो वादा  कि सदा तुम मेरी और  मैं तुम्हारा रहूंगा तोड़ कर चली गई सब वादे  नाम दिया इस रिश्ते को इक खेल का सोचा भी नहीं कि  मैं इस दर्द को कैसे सहूंगा मैं मौत चुनूंगा                         -  अभिषेक मिश्र

नामदेव कबीर तिलोचन सधना सेन तरै

 नामदेव कबीर तिलोचन सधना सेन तरै। कह रविदास, सुनहु रे संतहु ! हरि जिउ तें सबहि सरै। यह दोहा संत रविदास का है, जिसमें उन्होंने संतों के प्रति सम्मान व्यक्त करते हुए यह बताया है कि चाहे संत नामदेव हों, कबीर हों, तिलोचन हों, सधना हों या सेन हों—सभी का उद्धार और सभी की सिद्धि केवल हरि (भगवान) की कृपा से ही संभव है। दोहा का अर्थ:  "नामदेव, कबीर, तिलोचन, सधना और सेन सभी संतों ने अपने जीवन में साधना की है और ईश्वर का ध्यान किया है। संत रविदास कहते हैं कि सुनो, हे संतों! हरि (भगवान) की कृपा से ही सबकी सिद्धि होती है।" इस दोहे का मुख्य संदेश यह है कि संतों के सभी प्रयासों और उनकी साधना का सार भगवान की कृपा में है। भगवान के आशीर्वाद के बिना कोई भी व्यक्ति आध्यात्मिक उन्नति या मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकता। यह भक्ति का महत्व और भगवान की कृपा पर निर्भरता को दर्शाता है।

कफ़न (कहानी)/प्रेमचंद

एक   झोंपड़े के द्वार पर बाप और बेटा दोनों एक बुझे हुए अलाव के सामने चुपचाप बैठे हुए थे और अंदर बेटे की जवान बीवी बुधिया प्रसव-वेदना में पछाड़ खा रही थी। रह-रहकर उसके मुँह से ऐसी दिल हिला देने वाली आवाज़ निकलती थी, कि दोनों कलेजा थाम लेते थे। जाड़ों की रात थी, प्रकृति सन्नाटे में डूबी हुई, सारा गाँव अंधकार में लय हो गया था। घीसू ने कहा—“मालूम होता है, बचेगी नहीं। सारा दिन दौड़ते हो गया, जा देख तो आ।” माधव चिढ़कर बोला—”मरना ही है तो जल्दी मर क्यों नहीं जाती? देखकर क्या करूँ?” “तू बड़ा बेदर्द है बे! साल-भर जिसके साथ सुख-चैन से रहा, उसी के साथ इतनी बेवफ़ाई!” “तो मुझसे तो उसका तड़पना और हाथ-पाँव पटकना नहीं देखा जाता।” चमारों का कुनबा था और सारे गाँव में बदनाम। घीसू एक दिन काम करता तो तीन दिन आराम करता। माधव इतना कामचोर था कि आध घंटे काम करता तो घंटे भर चिलम पीता। इसलिए उन्हें कहीं मज़दूरी नहीं मिलती थी। घर में मुठ्ठी-भर भी अनाज मौजूद हो, तो उनके लिए काम करने की क़सम थी। जब दो-चार फ़ाक़े हो जाते तो घीसू पेड़ पर चढ़कर लकड़ियाँ तोड़ लाता और माधव बाज़ार से बेच लाता और जब तक वह पैसे रहते, द...

हम पंछी उन्मुक्त गगन के / शिवमंगल सिंह सुमन

हम पंछी उन्मुक्त गगन के पिंजरबद्ध न गा पाएँगे, कनक-तीलियों से टकराकर पुलकित पंख टूट जाएँगे। हम बहता जल पीनेवाले मर जाएँगे भूखे-प्यास, कहीं भली है कटुक निबौरी कनक-कटोरी की मैदा से। स्वर्ण-शृंखला के बंधन में अपनी गति, उड़ान सब भूले, बस सपनों में देख रहे हैं तरु की फुनगी पर के झूले। ऐसे थे अरमान कि उड़ते नीले नभ की सीमा पाने, लाल किरण-सी चोंच खोल चुगते तारक-अनार के दाने। होती सीमाहीन क्षितिज से इन पंखों की होड़ा-होड़ी, या तो क्षितिज मिलन बन जाता या तनती साँसों की डोरी। नीड़ न दो, चाहे टहनी का आश्रय छिन्न-भिन्न कर डालो, लेकिन पंख दिए हैं तो आकुल उड़ान में विघ्न न डालो।

मौन (कविता)/ अभिषेक मिश्र

  शब्द से परे , बात जग के सार की, अंतः जगत की , मन के व्यवहार की, धैर्य की , प्रलय की , आनंद समाधि की, मौन उद्घोषणा है, विकराल नाद की।                   ~अभिषेक मिश्र

तुम हो कौन???/Tum ho Kaun??? - अभिषेक मिश्र /ABHISEKH MISHRA

एक गलती की दो बार सजा ! एक बार निचली अदालत और दूसरी बार ऊपर सुप्रीम के द्वारा । लगनी चाहिए रोक ,किसी  एक पर  नीचे वालों को ऊपर राहत मिलेगी ?? नीचे की जेलों में काट ली गई सजा, ऊपर की अदालत घटाएगी ? क्या दोबारा नए सिरे से फैसला होगा ??? अवसर कब मिलेगा सुधरने का ?? पश्चाताप का तो अवसर गया, और होगा भी क्यों ,जब मिलेगा अवसर स्वीकारने का  कि हां हो गई थी भूल कि दोष था मेरा क्या हक ये भी नहीं ,जानने का। जब सब विधि का विधान है फिर विधान की विधि क्यों? रोग भी तुम्हारा और इलाज भी तुम क्यों ? ख़्वामखाह फंस गए हैं हम विधि भी तुम्हारी और विधान भी तुम दूर तक कोई किरण आती नहीं नज़र  छोर भी तुम्हारा और दरिया भी तुम अब ये क्या पागलपन है  समझ में  ये बात नहीं आता हमारी नाम जपे दिन रात तुम्हारा बचाओगे आकर इस दलदल से पहले ये बताओ तुम हो कौन?                 ~अभिषेक मिश्र

भारत में पत्रकारिता का जन्म और विकास

भारत में पत्रकारिता का जन्म और विकास प्रारंभिक चरण (18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध):  भारत में आधुनिक पत्रकारिता की शुरुआत 18   वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) से हुई। जनवरी 1780  में जेम्स ऑगस्टस हिक्की ने ‘हिक्कीज़ बंगाल गज़ट’ नामक अंग्रेज़ी साप्ताहिक समाचारपत्र निकाला, जिसे “एशिया का पहला समाचारपत्र” माना जाता है। यह सरकारी नीतियों विशेषकर वॉरेन हेस्टिंग्स की प्रशासन की आलोचना करने के लिए विख्यात हुआ। दो साल तक प्रकाशित रहने के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी ने इस अख़बार का प्रेस जब्त कर दिया। इसके बाद इंग्लिश भाषा में अन्य पत्रिकाएँ (जैसे India Gazette) आईं, लेकिन प्रारंभिक काल में अधिकांश प्रकाशन ब्रिटिश शासन या मिशनरियों द्वारा संचालित थे। पहला समाचारपत्र –  हिक्कीज़ बंगाल गज़ट  :  जनवरी 1780 को प्रकाशित हुआ यह अंग्रेजी-पत्र भारत (और एशिया) में पहला छपा हुआ अख़बार था। इसका प्रकाशक हिक्की एक आयरिश व्यवसायी था, जो अपने लहजे में कटु आलोचना के लिए जाना जाता था। हिक्की के संपादकीय स्वतंत्रता के नारे ने अंग्रेज़ प्रशासन को नाराज़ किया और अंततः ...

M.A (Hindi ) SYLLABUS प्रथम वर्ष |#VBSPU | SEMESTER - VII / द्वितीय प्रश्नपत्र /भक्तिकालीन काव्य

द्वितीय प्रश्न पत्र  / भक्तिकालीन काव्य इकाई 1:- भक्ति : अर्थ व स्वरूप , भक्ति का उदय , भक्ति आंदोलन भक्तिकाल : काल सीमा , परिस्थितियाँ , प्रवित्तियाँ , भक्तिकाल की शाखाएं -उपशाखाएँ , भक्तिकाल - स्वर्णयुग। इकाई 2 : - सन्त कबीर : जीवन वृत्त , रचनाएँ , काव्यगत विशेषताएँ , कबीर की भाषा , कबीर की भक्ति भावना , कबीर का दार्शनिक मत , रहस्यवाद , कबीर के राम , कबीर का भक्त तथा समाज सुधारक रूप , कबीर की प्रासंगिकता। ( साखी - 30 दोहे , सबद - 5 पद ) इकाई 3 :-  मलिक मुहम्मद जायसी : जीवन - वृत्त , रचनाएँ , मसनवी शैली और पद्मावत, जायसी का रहस्यवाद , प्रेमाख्यानक काव्य परम्परा में पद्मावत का स्थान, पद्मावत अन्योक्ति या समासोक्ति काव्य, पद्मावत में विरह वर्णन , पद्मावत की काव्यगत विशेषताएँ । (पद्मावत -एक खण्ड ) इकाई 4 :- महाकवि सूरदास : जीवन वृत्त , रचनायें , काव्यगत विशेषताएँ , सूरदास की भाषा , सूरदास की भक्ति भावना , सूर काव्य का दार्शनिक आधार , पुष्टिमार्ग , अष्टछाप, सूर वात्सल्य रस सम्राट , सूरदास का भ्रमरगीत , सूर की सहृदयता , भावुकता एवं वाग्विग्धता, सूर का श्रृंगारवर्णन । (25...

दोहा

दोहा की परिभाषा दोहा एक अर्द्धसम मात्रिक छंद है, जिसमें दो पंक्तियाँ (अर्धालियाँ) होती हैं। प्रत्येक पंक्ति में दो चरण होते हैं: पहले और तीसरे चरण (विषम चरण) में 13 मात्राएँ दूसरे और चौथे चरण (सम चरण) में 11 मात्राएँ इस प्रकार, एक दोहे में कुल 24 मात्राएँ होती हैं।