प्रेम /prem
किसी महोदय ने हमसे पूछा
क्या तुम्हें प्रेम हुआ है ?
प्रेम होता है? व्यंग्य से
उनसे, मैंने पूछा
महोदय ने कहा तुरंत
और क्या, सबको होता है।
एक बार तो होता ही है , प्रेम
जीवन का रस है
क्या इसको करना होता है?
मैंने पूछा
और नहीं तो क्या !
कहा, उन्होंने
नहीं करूँ तो ? पूछा आश्चर्य भाव से, मैने
तो तुम वंचित रह जाओगे
परमात्मा की दी गई अनुपम भेंट से
मैने फिर आश्चर्य प्रकट किया
भेंट जब मिली है
तो वंचना कैसी?
कहा उन्होंने , अरे भाइ !
प्रयोग नहीं करोगे तो खो जाएगी, भेंट
किसी और की हो जाएगी
देने वाला, ले लेगा ? क्या,
ऐसा कंगाल है? पूछा मैंने
तो तुम्हें क्या लगता है?
क्या है प्रेम ? थककर उन्होने, पूछा
प्रेम स्वभाव है ईश्वर का
प्रेम मार्ग है ईश्वर का
सद्गुण है ये संतो का
प्रेम सार है सब धर्मों का
प्रेम प्रकृति का है, वो स्वभाव
नारी में जो ममत्व भाव
पोषण जो देती है निःस्वार्थ
प्रेरित करती जो परमार्थ
प्रेम परिणति आकर्षण का
प्रथम रश्मि है सूरज का
प्रेम परमगति संतों का
मधुर सुगन्ध है फूलों का
प्रेम मोक्ष है माया से
प्रेम मुक्ति है काया से
जीवन को आनंदित कर दे
हृदयों को आहलादित कर दे
वासना को तिरोहित कर दे
नर को जो 'नारायण' कर दे
प्रेम प्रकृति का वो पूज्य भाव
सिखलाता जो मुक्ति का चुनाव
प्रेम होता है नहीं
प्रेम सहृदय का स्वभाव, मैने कहा।
~अभिषेक मिश्र
( 27 अप्रैल , 2025 , 9:48 am )
Intriguing
ReplyDeleteआभार
Delete👌
ReplyDelete🙌
ReplyDeleteअति सुंदर अभिषेक जी
ReplyDeleteअति सुंदर अभिषेक जी
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