यद् भावं तद् भवति

              यह संस्कृत की एक कहावत है जिसका अर्थ है “आप वही हैं जो आप विश्वास करते हैं,” या “आप जैसा सोचते हैं वैसा बन जाते हैं।” आपके विचार आपके व्यवहार को प्रभावित करते हैं, और आपका व्यवहार आपके चरित्र को प्रभावित करता है ।
अपने विचार और व्यवहार दोनों में प्रेम को समादृत करें। हमारे समाज में एक गलत धारणा है कि जो प्रेम की बात करता है वह कायर होता है , नहीं ऐसा बिल्कुल नहीं है बल्कि केवल सामर्थवान ही प्रेम कर सकता है। अंग्रेजी में एक कहावत है ' रिफॉर्म इज की टू रेलिवेंस (Reform is key to relevance)' अर्थात सुधार आपको प्रासंगिक बनाकर रखेगा। जैसे पशु- बलि , सती प्रथा , छुआ - छूत आदि विकृतियों को त्यागकर हम आज भी प्रासंगिक बने हुए हैं । प्रासंगिकता का एक अर्थ यह भी है कि आपके साथ लोग संबंध रखना चाहते हैं। हमें बौद्धों से दिक्कत हो सकती है लेकिन महात्मा बुद्ध से नहीं क्योंकि वे आज भी प्रासंगिक हैं। जैसे किसी को राम को मानने वाले से दिक्कत हो सकती है परंतु श्री राम से नहीं। उनके पिता राजा दशरथ ने तीन विवाह किए , वह उनके समय के लिए प्रासंगिक हो सकता है लेकिन राम ने केवल एक विवाह किया जो कि आज के युग के लिए आदर्श है इसीलिए राम आज भी प्रासंगिक है। इसी प्रकार हमें भी उन नियमों , विचारों को व्यवहार में लाना चाहिए जो कि आने वाले युग के लिए प्रासंगिक हो। और जो हमेशा प्रासंगिक बना रहेगा वह है ' प्रेम '। इसीलिए अपने व्यक्तित्व में सहजता , सरलता और प्रेम को समादृत करिए । अलग - अलग झुंड बनाकर चलना अब प्रासंगिक नहीं रह गया , हमें प्रेम और एकता की बातें करनी चाहिए। अब पूरा विश्व धीरे धीरे अत्याधुनिक तकनीकों के माध्यम से एक हो रहा है । भारत विश्व पटल पर ' वसुधैव कुटुंबकम् ' की बात कर रहा है। हमें भी किसी व्यक्तिगत व्यक्ति , राजनीतिक पार्टी के विचारों से इतर प्रेम और सामंजस्य बनाकर एक साथ समृद्ध और खुशहाल होने का संकल्प लेना होगा। जैसा कि आरंभ में ही संस्कृत की उक्ति कह रही कि जैसा हम सोचेंगे वैसे ही हम या हमारा व्यक्तित्व होगा।उम्मीद है यह लेख आप सभी को पसंद आया होगा।         

                                         - अभिषेक मिश्र

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