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Showing posts from May, 2025

अशोक के फूल /ashok ke fool - हजारी प्रसाद द्विवेदी

  अशोक के फिर फूल आ गए हैं। इन छोटे-छोटे, लाल-लाल पुष्पों के मनोहर स्तबकों में कैसा मोहन भाव है! बहुत सोच-समझकर कंदर्प देवता ने लाखों मनोहर पुष्पों को छोड़कर सिर्फ़ पाँच को ही अपने तूणीर में स्थान देने योग्य समझा था। एक यह अशोक ही है। लेकिन पुष्पित अशोक को देखकर मेरा मन उदास हो जाता है। इसलिए नहीं कि सुंदर वस्तुओं को हतभाग्य समझने में मुझे कोई विशेष रस मिलता है। कुछ लोगों को मिलता है। वे बहुत दूरदर्शी होते हैं। जो भी सामने पड़ गया उसके जीवन के अंतिम मुहूर्त तक का हिसाब वे लगा लेते हैं। मेरी दृष्टि इतनी दूर तक नहीं जाती। फिर भी मेरा मन इस फूल को देखकर उदास हो जाता है। असली कारण तो मेरे अंतर्यामी ही जानते होंगे, कुछ थोड़ा-सा मैं भी अनुमान कर सका हूँ। बताता हूँ। भारतीय साहित्य में, और इसलिए जीवन में भी, इस पुष्प का प्रवेश और निर्गम दोनों ही विचित्र नाटकीय व्यापार है। ऐसा तो कोई नहीं कह सकेगा कि कालिदास के पूर्व भारतवर्ष में इस पुष्प का कोई नाम ही नहीं जानता था, परंतु कालिदास के काव्यों में यह जिस शोभा और सौकुमार्य का भार लेकर प्रवेश करता है वह पहले कहाँ था! उस प्रवेश में नववधू के गृह-...

जौनपुरी बोली / जौनपुरी भाषा

यद् भावं तद् भवति

              यह संस्कृत की एक कहावत है जिसका अर्थ है “आप वही हैं जो आप विश्वास करते हैं,” या “आप जैसा सोचते हैं वैसा बन जाते हैं।” आपके विचार आपके व्यवहार को प्रभावित करते हैं, और आपका व्यवहार आपके चरित्र को प्रभावित करता है । अपने विचार और व्यवहार दोनों में प्रेम को समादृत करें। हमारे समाज में एक गलत धारणा है कि जो प्रेम की बात करता है वह कायर होता है , नहीं ऐसा बिल्कुल नहीं है बल्कि केवल सामर्थवान ही प्रेम कर सकता है। अंग्रेजी में एक कहावत है ' रिफॉर्म इज की टू रेलिवेंस (Reform is key to relevance)' अर्थात सुधार आपको प्रासंगिक बनाकर रखेगा। जैसे पशु- बलि , सती प्रथा , छुआ - छूत आदि विकृतियों को त्यागकर हम आज भी प्रासंगिक बने हुए हैं । प्रासंगिकता का एक अर्थ यह भी है कि आपके साथ लोग संबंध रखना चाहते हैं। हमें बौद्धों से दिक्कत हो सकती है लेकिन महात्मा बुद्ध से नहीं क्योंकि वे आज भी प्रासंगिक हैं। जैसे किसी को राम को मानने वाले से दिक्कत हो सकती है परंतु श्री राम से नहीं। उनके पिता राजा दशरथ ने तीन विवाह किए , वह उनके समय के लिए प्रासंगिक हो सकता है ...

मातृभाषा हिंदी की सेवा

हिंदी भाषी लोग केवल ये चाहते हैं कि हिंदी राष्ट्रभाषा हो जाए । उत्तर से लेकर दक्षिण तक , पूरब से लेकर पश्चिम तक सभी हिंदी बोलने लगें । पर उनका खुद का योगदान बस इतना है कि वे पैदा हो गए और उनके परिवार में बोली जाती थी तो वे स्वतः सीख लिए। खुद हिंदी भाषियों को ढंग से हिंदी -लिखना और पढ़ना नहीं आता और वे चाहते हैं कि भारत के अन्य राज्य ही नहीं पूरी दुनिया हिंदी पढ़ने , बोलने और समझने लगे । हिंदी की रचनाओं के प्रकाशन में अपना विशिष्ट योगदान देने वाले प्रकाशक अब दूसरे व्यवसाय के तरफ पलायन को हो रहे और बहुत तो कर चुके। हिंदी भाषियों का काम सोशल मीडिया जैसे प्लेटफॉर्म पर रील्स और शॉर्ट पर कुमार विश्वास समान काव्य वक्ताओं से चल जा रहा , पढ़ने की आवश्यकता ही नहीं। जब आप पढ़ेंगे नहीं तो हिंदी की रचनाएं छपेंगी क्यों?           हिंदी क्षेत्र में नई संभावनाएं कैसे खुलेंगी?? नई प्रतिभाएं आगे कैसे आएंगी??          यदि आप सचमुच हिंदी को अपनी माँ समझते हैं तो उसके मान - सम्मान की रक्षा के लिए आप क्या कर रहे?? * अंतिम हिंदी की कहानी जो आपने पढ़ी हो ?...

आदिकाल -शॉर्ट नोट्स

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हिंदी साहित्य : आदिकाल – माइक्रो नोट काल-सीमा • 1050 विक्रमी संवत  से 1375 विक्रमी संवत तक (कुछ विद्वान 1000 ई . से 1400 ई. तक मानते हैं) मुख्य विशेषताएँ • धर्म और वीरता प्रधान साहित्य • राजाओं की वीरता, युद्धकौशल, और चारित्रिक गुणों का वर्णन • वीरगाथा परंपरा की स्थापना • भाषा : अपभ्रंश मिश्रित ब्रज या पश्चिमी हिंदी मुख्य काव्यधाराएँ 1. वीरगाथा काव्य • चारण परंपरा से जुड़ा • मुख्य रूप से रासो काव्य शैली में • राजा-रजवाड़ों के युद्ध, शौर्य का वर्णन 2. प्रबन्ध काव्य • गद्य-पद्य मिश्रित • ऐतिहासिक व धार्मिक घटनाओं का वर्णन प्रमुख रचनाएँ व रचनाकार • पृथ्वीराज रासो – चंदबरदाई • हम्मीर रासो – जोधराज • बीसलदेव रासो – नरपति नाल्ह • पृथ्वीराज विजय – जयानक आदिकालीन जैन - ग्रंथाकार एवं उनकी रचनाएं :  वीरगाथाकालीन रचनाएँ एवं उनके रचनाकार : भाषा शैली • प्रमुख रूप से अपभ्रंश और ब्रज मिश्रित हिंदी • तत्सम शब्दों की अधिकता • पद्य रूप में रचना, दोहा-चौपाई छंदों का प्रयोग महत्वपूर्ण बिंदु (MCQ Focus) • आदिकाल को वीरगाथा काल भी कहते हैं • पृथ्वीराज रासो का मूल रूप लघु था,...

तराजू पर प्रेम / taraajoo par prem - अभिषेक मिश्र abhishek mishra

  बैठकर यूँ ही कभी - कभी   मन     के     तराजू      पर    तौलता   हूँ    हमारा    प्रेम    अब तुम नहीं हो    पर फिर भी   कभी - कभी तुम्हारा पलड़ा    ज्यादा भारी पड़ता है ।                                अभिषेक मिश्र                     ( 6 मई 2025 , 12: 45 pm)

प्रेमचंद /Premchand

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प्रेमचंद ( 31 जुलाई 1880 - 8 अक्टूबर 1936)