किसी महोदय ने हमसे पूछा क्या तुम्हें प्रेम हुआ है ? प्रेम होता है? व्यंग्य से उनसे, मैंने पूछा महोदय ने कहा तुरंत और क्या, सबको होता है। एक बार तो होता ही है , प्रेम जीवन का रस है क्या इसको करना होता है? मैंने पूछा और नहीं तो क्या ! कहा, उन्होंने नहीं करूँ तो ? पूछा आश्चर्य भाव से, मैने तो तुम वंचित रह जाओगे परमात्मा की दी गई अनुपम भेंट से मैने फिर आश्चर्य प्रकट किया भेंट जब मिली है तो वंचना कैसी? कहा उन्होंने , अरे भाइ ! प्रयोग नहीं करोगे तो खो जाएगी, भेंट किसी और की हो जाएगी देने वाला, ले लेगा ? क्या, ऐसा कंगाल है? पूछा मैंने तो तुम्हें क्या लगता है? क्या है प्रेम ? थककर उन्होने, पूछा प्रेम स्वभाव है ईश्वर का प्रेम मार्ग है ईश्वर का सद्गुण है ये संतो का प्रेम सार है सब धर्मों का प्रेम प्रकृति का है, वो स्वभाव नारी में जो ममत्व भाव पोषण जो देती है निःस्वार्थ प्रेरित करती जो परमार्थ प्रेम परिणति आकर्षण का प्रथम र...
हिंदी भाषी लोग केवल ये चाहते हैं कि हिंदी राष्ट्रभाषा हो जाए । उत्तर से लेकर दक्षिण तक , पूरब से लेकर पश्चिम तक सभी हिंदी बोलने लगें । पर उनका खुद का योगदान बस इतना है कि वे पैदा हो गए और उनके परिवार में बोली जाती थी तो वे स्वतः सीख लिए। खुद हिंदी भाषियों को ढंग से हिंदी -लिखना और पढ़ना नहीं आता और वे चाहते हैं कि भारत के अन्य राज्य ही नहीं पूरी दुनिया हिंदी पढ़ने , बोलने और समझने लगे । हिंदी की रचनाओं के प्रकाशन में अपना विशिष्ट योगदान देने वाले प्रकाशक अब दूसरे व्यवसाय के तरफ पलायन को हो रहे और बहुत तो कर चुके। हिंदी भाषियों का काम सोशल मीडिया जैसे प्लेटफॉर्म पर रील्स और शॉर्ट पर कुमार विश्वास समान काव्य वक्ताओं से चल जा रहा , पढ़ने की आवश्यकता ही नहीं। जब आप पढ़ेंगे नहीं तो हिंदी की रचनाएं छपेंगी क्यों? हिंदी क्षेत्र में नई संभावनाएं कैसे खुलेंगी?? नई प्रतिभाएं आगे कैसे आएंगी?? यदि आप सचमुच हिंदी को अपनी माँ समझते हैं तो उसके मान - सम्मान की रक्षा के लिए आप क्या कर रहे?? * अंतिम हिंदी की कहानी जो आपने पढ़ी हो ?...
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