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Showing posts from September, 2024

चलिअ वीर हम्मीर पाअभर मेइणि कंपई

 चलिअ वीर हम्मीर पाअभर मेइणि कंपई । दिगमग णह अंधार धूलि सुररह आच्छाइहि ॥ पाअभर = पाँव / चरणों के भार से । मेइणि = पृथ्वी / धरती । कंपइ = काँपती है । दिगमग = दिग अर्थात् दिशा और मग अर्थात् मार्ग / रास्ता । णह = आकाश / आसमान । अंधार = अंधेरा धूलि = धूल , मिट्टी ,गर्दा, धूर । सुररह = सूर्य - रथ आच्छाइहि = आच्छादित अर्थात् ढँक लेती है।

भारतेंदु हरिश्चंद्र

  भारतेंदु हरिश्चंद्र और उनका साहित्य काव्य संग्रह :-  प्रेम मालिका प्रेम सरोवर प्रेम माधुरी प्रेम प्रलाप प्रेम तरंग फूलों का गुच्छा वर्षा विनोद विजय वल्लरी  नाटक : - ( कुल सत्रह - मौलिक एवं अनूदित ) 1.चंद्रावली 2.सती प्रताप 3.नील देवी 4.भरता दुर्दशा 5.अंधेर नगरी 6.विषस्य विषमौषधम 7.प्रेम योगिनी 8.वैदिक हिंसा हिंसा न भवति  9.रत्नावली 10.पाखंड विडंबन 11.धनंजय विजय 12.मुद्राराक्षस  13.कर्पूर मंजरी 14.दुर्लभ बंधु  15.पांचवें पैगंबर 16.विद्यासुंदर 17.भारत जननी

कवि सेवक बूढ़े भए तौ कहा पै हनोज है मौज मनोज ही की

" कवि सेवक बूढ़े भए तौ कहा पै हनोज है मौज मनोज ही की" - सेवक जी कहते हैं कि बूढ़े हो गए हैं तो क्या हुआ अभी भी कामदेव की ही मौज है