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संभावनाएं अतीत में

संभावनाएँ भविष्य में , जिसको आती नहीं नज़र राहत अतीत में  खोजता वो नज़र आता है ।    (30 मई, 7.25 pm)

अपना अपना भाग्य (कहानी ) / जैनेन्द्र कुमार

एक बहुत कुछ निरुद्देश्य घूम चुकने पर हम सड़क के किनारे की एक बेंच पर बैठ गए। नैनीताल की संध्या धीरे-धीरे उतर रही थी। रूई के रेशे-से भाप-से, बादल हमारे सिरों को छू-छूकर बेरोक घूम रहे थे। हल्के प्रकाश और अँधियारी से रंगकर कभी वे नीले दीखते, कभी सफ़ेद और फिर देर में अरुण पड़ जाते। वे जैसे हमारे साथ खेलना चाह रहे थे। पीछे हमारे पोलो वाला मैदान फैला था। सामने अँग्रेज़ों का एक प्रमोद-गृह था, जहाँ सुहावना- रसीला बाजा बज रहा था और पार्श्व में था वही सुरम्य अनुपम नैनीताल। ताल में किश्तियाँ अपने सफ़ेद पाल उड़ाती हुई एक-दो अँग्रेज़ यात्रियों को लेकर, इधर से उधर और उधर से इधर खेल रही थीं और कहीं कुछ अँग्रेज़ एक-एक देवी सामने प्रतिस्थापित कर, अपनी सुई-सी शक्ल की डोंगियों को, मानो शर्त बाँधकर सरपट दौड़ा रहे थे। कहीं किनारे पर कुछ साहब अपनी बंसी पानी में डाले, सधैर्य, एकाग्र, एकस्थ, एकनिष्ठ मछली-चिंतन कर रहे थे। पीछे पोलो-लॉन में बच्चे किलकारियाँ मारते हुए हॉकी खेल रहे थे। शोर, मार-पीट, गाली-गलौच भी जैसे खेल का ही अंश था। इस तमाम खेल को उतने क्षणों का उद्देश्य बना, वे बालक अपना सारा मन, सारी देह, समग...

पिता (कहानी) /ज्ञानरंजन

उसने अपने बिस्तरे का अंदाज़ लेने के लिए मात्र आध पल को बिजली जलाई। बिस्तरे फ़र्श पर बिछे हुए थे। उसकी स्त्री ने सोते-सोते ही बड़बड़ाया, ‘आ गए’ और बच्चे की तरफ़ करवट लेकर चुप हो गई। लेट जाने पर उसे एक बड़ी डकार आती मालूम पड़ी, लेकिन उसने डकार ली नहीं। उसे लगा कि ऐसा करने से उस चुप्पी में ख़लल पड़ जाएगा, जो चारों तरफ़ भरी है, और काफ़ी रात गए ऐसा होना उचित नहीं है। अभी घनश्यामनगर के मकानों के लंबे सिलसिलों के किनारे-किनारे सवारी गाड़ी धड़धड़ाती हुई गुज़री। थोड़ी देर तक एक बहुत साफ़ भागता हुआ शोर होता रहा। सर्दियों में जब यह गाड़ी गुज़रती है तब लोग एक प्रहर की ख़ासी नींद ले चुके होते हैं। गर्मियों में साढ़े ग्यारह का कोई विशेष मतलब नहीं होता। यों उसके घर में सभी जल्दी सोया करते, जल्दी खाया और जल्दी उठा करते हैं। आज बेहद गर्मी है। रास्ते-भर उसे जितने लोग मिले, उन सबने उससे गर्म और बेचैन कर देने वाले मौसम की ही बात की। कपड़ों की फ़ज़ीहत हो गई। बदहवासी, चिपचिपाहट और थकान है। अभी जब सवारी गाड़ी शोर करती हुई गुज़री, तो उसे ऐसा नहीं लगा कि नींद लगते-लगते टूट गई हो जैसा जाड़ों में प्रायः लगता है। बल्कि यों ल...