Posts

Showing posts from March, 2025

नैना लोभी रे बहुरि सके नहिं आय।

नैना लोभी रे बहुरि सके नहिं आय । रोम - रोम नख-सिख सब निरखत, ललच रहे ललचाय ।। मैं ठाढ़ी गृह आपने रे, मोहन निकसे आय ।  सारंग ओट तजे कुल अंकुस, बदन दिये मुस्काय ।। लोक कुटुंबी बरज-बरज ही, बतियाँ कहत बनाय ।  चंचल चपल अटक नहिं मानत, पर हथ गये बिकाय ।। भली कहो कोई बुरी कहो मैं, सब लई सीस चढ़ाय । मीरा कहे प्रभु गिरधर के बिन, पल भर रह‌यो न जाय ।

कविता /kavita -Abhisekh Mishra

 कविता ,केवल   किसी प्रेमी का गीत भर नहीं कविता वो जो स्फूर्ति भर दे जीवन नवपथ प्रेरित कर दे प्रेम सिखाए पर ऐसा  जो सब जीवों को अपना कर दे किसी माशूका की बाहों का  ख़्याल भर नहीं  कविता वो जो नर को नारायण कर दे जो प्रेमी की विरह का शोकगीत भर नहीं जो माशूका की आंखों का वर्णन भर नहीं, जो माशूका की यादों का किस्सा भर नहीं जो तुमको अपना कर दे  जो तुमको खुद से मिलवाए  वो है , कविता जो सच से आँखें चार कराए  वो है कविता जो सोए को जगाए वो है कविता...        ~अभिषेक मिश्र