नैना लोभी रे बहुरि सके नहिं आय।
नैना लोभी रे बहुरि सके नहिं आय । रोम - रोम नख-सिख सब निरखत, ललच रहे ललचाय ।। मैं ठाढ़ी गृह आपने रे, मोहन निकसे आय । सारंग ओट तजे कुल अंकुस, बदन दिये मुस्काय ।। लोक कुटुंबी बरज-बरज ही, बतियाँ कहत बनाय । चंचल चपल अटक नहिं मानत, पर हथ गये बिकाय ।। भली कहो कोई बुरी कहो मैं, सब लई सीस चढ़ाय । मीरा कहे प्रभु गिरधर के बिन, पल भर रहयो न जाय ।